Tuesday, 28 June 2016

अबॉर्शन कराना मतलब डिप्रेशन को न्यौता देना

मां बनना हर एक महिला के लिए एक सपने जैसे होता है। जब लड़कियों में हार्मोनल बदलाव आते हैं और वह किशोरी होती हैं तभी से वह दीदी-भाभी से गर्भावस्था के मीठे अनुभवों को सुनकर खुश होने लगती हैं। अक्सर देखा जाता है कि जब एक महिला गर्भवती होती है यानि कि मां बनने वाली होती है तो वह खुद को दुनिया की सबसे भाग्यशाली महिला महसूस करती है।


लेकिन हम जिस समाज में रहते हैं उसमें कई बार ऐसी स्थिति भी देखने को मिलती है जब गर्भवती होता एक महिला के लिए अभिश्राप साबित हो जाता है। जिसके चलते महिला के पास अॅर्बाशन के अलावा और कोई विकल्प नहीं बचता। लेकिन अबॉर्शन सीधे तौर पर समस्या का समाधान नहीं है। अबॉर्शन एक महिला के लिए काफी महंगा सौदा साबित होता है। क्योंकि अबॉर्शन के बाद एक महिला को जितना कष्ट शारीरिक तौर पर झेलना पड़ता है, उससे कहीं ज्यादा मानसिक स्तर पर होता है।


 अबॉर्शन यानि कि डिप्रेशन
एक महिला चाहे किसी भी स्थिति में अबॉर्शन कराएं। लेकिन अपने शिशु को खो जाने का दुख वह मानसिक रूप से कभी स्वीकार नहीं कर पाती है। इस दुख को जब एक महिला हद से ज्यादा गंभीरता से लेने लगती है तो फिर एक ऐसी स्टेज आती है जब महिला डिप्रेशन की शिकार हो जाती है। साथ ही अबॉर्शन के बाद अचानक ही महिलाओं  के शरीर में हार्मोनल बदलाव होते हैं। जो डिप्रेशन और बैचैनी को स्पष्ट तौर पर न्यौता देते हैं।


ये डिप्रेशन इस हद तक हो जाता है कि पीड़ित महिला के मौत होने की भी पूरी संभावना रहती है। ये डिप्रेशन भी दो प्रकार के होते हैं। पहला ऐसा होता है जिसमें महिला अबॉर्शन के बाद खुद को खुद को कठोर और सामान्य दिखाना चाहती है। जबकि अंदर से वह पूरी टूट चुकी है। और उसका ये अकेलापन उसकी जान से सौदा कर बैठता है। वहीं, दूसरे तरह के डिप्रेशन में महिला अबॉर्शन के बाद अपनी भावनाओं को व्यक्त तो करती है लेकिन कोई विकल्प ना होने के चलते वह और ज्यादा डिप्रेस्ड हो जाती है। इसलिए हम आपसे यही कहेंगे कि ​अबॉर्शन कराने से पहले एक नहीं बल्कि कई बार सोचिए। क्योंकि हमें आपकी फिक्र है।

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